बिहार की राजनीति इन दिनों गर्म है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बिहार दौरे ने राज्य में राजनीतिक हलचल को और बढ़ा दिया है। ऐसा लग रहा है कि बिहार में झूठ और जुमलों की बारिश होने वाली है। लेकिन इस बार मोदी और नीतीश कुमार की जोड़ी बिहार को विकास के तोहफे देने में जुटी हुई है। आइए, जानते हैं कि बिहार की राजनीति में क्या हो रहा है और कौन किसके साथ है।
मोदी-नीतीश की जोड़ी का दबदबा
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जोड़ी बिहार को योजनाओं के तोहफे दे रही है। पीएम किसान योजना की 19वीं किस्त, गोकुल मिशन और रेलवे प्रोजेक्ट्स जैसी योजनाओं के जरिए एनडीए बिहार की जनता का दिल जीतने की कोशिश कर रही है। मोदी की चुनावी तीरंदाजी का असर दिख रहा है, लेकिन सवाल यह है कि क्या ये योजनाएं बिहार की जनता का दिल जीत पाएंगी?
लालू यादव और तेजस्वी का सपना
लालू यादव और उनकी पार्टी आरजेडी भी इस चुनावी जंग में पीछे नहीं हटने वाले हैं। लालू का सपना है कि उनका बेटा तेजस्वी यादव बिहार का मुख्यमंत्री बने। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती कांग्रेस और राहुल गांधी की है। राहुल गांधी बिहार में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। उनका प्लान है कि बिना किसी गठबंधन के बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा जाए। लेकिन सवाल यह है कि क्या बिहार की जनता राहुल के इस प्लान को स्वीकार करेगी?
राहुल गांधी की चुनौती
राहुल गांधी ने दिल्ली में अंडे पर अंडा स्कोर करने के बाद अब बिहार में अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी की है। उनका प्लान साफ है – बिना किसी गठबंधन के, अकेले दम पर बिहार की सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ना। यानी आरजेडी और लालू यादव को साइडलाइन पर धकेलने की तैयारी। लेकिन सवाल यह है कि क्या बिहार की जनता राहुल के इस प्लान को स्वीकार करेगी? दिल्ली के चुनाव में 50% बिहारियों ने भाजपा को वोट दिया था। ऐसे में इस बार बिहार के चुनाव में भी भाजपा के पक्ष में माहौल बनता दिख रहा है।
जातीय समीकरण का रोल
बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण बहुत बड़ा रोल निभाता है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि एनडीए और आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन इस चुनाव को कैसे लड़ते हैं। क्या नीतीश कुमार की “सुशासन” की छवि और मोदी के “विकास” के नारे के साथ मिलकर एनडीए को बिहार में जीत मिल पाएगी? या फिर जातीय समीकरण के चलते आरजेडी और कांग्रेस को फायदा होगा?
कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई
कांग्रेस के अंदर भी दो धड़े साफ नजर आ रहे हैं। एक धड़ा गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने की बात कर रहा है, तो दूसरा धड़ा अकेले चुनाव लड़ने पर अड़ा हुआ है। क्या कांग्रेस इस अंदरूनी लड़ाई से बाहर निकल पाएगी? या फिर यह लड़ाई उनकी हार का कारण बनेगी? क्योंकि कांग्रेस अगर लालू यादव के साथ चुनाव लड़ेगी, तभी एनडीए को कुछ नुकसान पहुंचा पाएगी। वरना कांग्रेस अकेले चुनाव लड़कर कोई खास असर नहीं दिखा पाएगी।
कौन बनेगा बिहार का बादशाह?
इस चुनाव में सबसे बड़ा सवाल यह है कि कौन बनेगा बिहार का बादशाह? क्या राहुल गांधी बिहार में कांग्रेस को फिर से जीवित कर पाएंगे? या फिर मोदी-नीतीश की जोड़ी एक बार फिर बिहार में अपना जादू चला पाएगी? क्या लालू यादव और तेजस्वी यादव इस चुनावी जंग में अपनी जगह बना पाएंगे?
बिहार की जनता के सामने यह बड़ा फैसला है। विकास के नारे और जातीय समीकरण के बीच बिहार की राजनीति का भविष्य तय होगा। अब यह देखना बाकी है कि बिहार की जनता किसे चुनती है – राहुल गांधी, मोदी-नीतीश, या फिर लालू-तेजस्वी?